‘मैंने सब कुछ काम करते हुए सीखा, शानदार टीम के साथ अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी चलाती हूं।’ दुनिया भर में सराही गईं प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा (Guneet Monga) कहती हैं!

फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट में प्रकाशित गुनीत मोंगा के इंटरव्यू का अंश, पढ़ें हिंदी अनुवाद

मुंबई, प्रसिद्ध फिल्म प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा (Guneet Monga, Producer) कहती हैं, ‘अ लाइफ लेस ऑर्डिनरी: मैंने सब कुछ काम करते हुए सीखा। गुनीत हाल ही में आकांक्षा नवल-शेटे (Aakanksha Naval-Shetye) के साथ फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट के एक विशेष साक्षात्कार के लिए बातचीत की हैं। जिसमें उन्होंने अपने सिनेमा करियर में चुनौतीपूर्ण विकल्पों तथा अंतरराष्ट्रीय फिल्म पटल पर भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व करने के बारे में खुल कर बात की।

गुनीत मोंगा न सिर्फ भारतीय फिल्म इंडस्ट्री बल्कि, वर्ल्ड सिनेमा में भी खुद को बतौर फिल्म निर्मात्री पुरजोरता से स्थापित करती हैं। मोंगा को न केवल समीक्षकों द्वारा सराहा गया है, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी बड़ी कमर्शियल सक्सेस पाने में सफल रही हैं। फिल्म बिट्टू (Bittu) के लिए सराही जाने के बाद डॉक्यू शॉर्ट कैटेगरी में ऑस्कर वीनर फिल्म ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेन्स’ (Period. End of A Sentence) की भी निर्मात्री रह चुकी हैं। फिल्म बिट्टू को एकता कपूर, गुनीत मोंगा और ताहिरा कश्यप ने अपनी इंडियन वूमेन राइजिंग पहल के तहत प्रस्तुत किया था। कई बेहतरीन सिनेमा, जैसे द लंचबॉक्स (The Lunchbox) मसान (Masaan) हरामखोर (Haraamkhor) गैंग्स ऑफ वासेपुर (Gangs of Wasseypur 1,2) सोरारई पोट्रु (Soorarai Pottru) पगलैट (Pagglait) के साथ इन्होंने साबित किया है कि वह फिल्म-प्रेमियों के नब्ज समझती हैं। आकांक्षा नवल-शेटे के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, गुनीत मोंगा अपने सिनेमाई यात्रा में सफलता के बारे में बातचीत करती हैं।

फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट में प्रकाशित गुनीत मोंगा के इंटरव्यू का अंश, पढ़ें हिंदी अनुवाद (Guneet Monga’s Hindi interview)

मैंने सब कुछ काम करते हुए सीखा’, विश्व स्तर पर सराही गईं प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा (Guneet Monga) कहती हैं!
इमेज क्रेडिट: फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट। फाइल फोटो
आपकी फिल्में सार्थक सिनेमा और मुख्यधारा के व्यावसायिक के बीच सही संतुलन बनाती हैं, लिहाजा बतौर प्रोड्यूसर क्या दूरदर्शिता होती है?

मैं जब भी कोई स्टोरी सुनती हूं, तो मैं यह कल्पना करने की कोशिश करती हूं कि यह कहानी कितनी दूर तक और कितनी बातें कह सकती है। इसके बाद सोचती हूं कि इसे पूरा करने के लिए मैं क्या कुछ कर सकती हूं। फिल्म में दिखने वाली हर कहानी में कुछ न कुछ खास होता है। कमर्शियल सक्सेस का मतलब हमेशा 100 करोड़ क्लब में शामिल होना नहीं है। बल्कि, यह सुनिश्चित करना होता है कि बजट से प्रोजेक्ट को नुकसान न हो। साथ ही मुझे लगता है कि सार्थक सिनेमा और व्यावसायिक सफलता एक-दूसरे से बहुत भिन्न नहीं हैं। भले ही बॉक्स ऑफिस नंबर ही एकमात्र कीर्तिमान हों, फिर भी विषय परक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। इसके लिए सही संतुलन बनाने की जरूरत होती है। ऐसी फिल्मों में लंचबॉक्स, स्त्री (Stree), बधाई हो (Badhaai Ho), न्यूटन (Newton), सीक्रेट सुपरस्टार (Secret Superstar) जैसी फिल्में शामिल हैं। प्रोड्यूसर के पास दर्शकों की नब्ज, कंटेंट के दायरे को समझने के लिए विजन होना चाहिए। फिल्म बनने के बाद दोनों का सही तालमेल बनना आवश्यक है। मैं हमेशा कहानी के लिए सही फॉर्मेट के चयन के साथ उसे सही पैकेजिंग और मंच पर लाने की कोशिश करती हूं। इतना लंबा सफर तय करने के बाद, स्टोरीटेलिंग के अलग-अलग फॉर्मेट में प्रवेश करना, मैं कहूंगी कि बहुत रोमांचक है।

स्टोरीटेलिंग के अलग-अलग फॉर्मेट आप कह रही थीं, कुछ आपकी फिल्में जो प्रस्तुतीकरण में इस तरह की विविधताएं रखती हैं?

हर कहानी एक विचार के रूप में शुरू होती है और मेरी जर्नी उस विचार को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना है। उस आइडिया को डेवलप करने के लिए कौन सा फॉर्मेट ज्यादा उपयुक्त है; चाहे वह पॉडकास्ट हो, शॉर्ट फिल्म हो, सीरीज हो, फीचर हो या डॉक्यूमेंट्री हो, हमारे पास आज कई मीडियम हैं। सिख्या एंटरटेनमेंट (Sikhya Entertainment) में मनोरंजन के इन विभिन्न माध्यमों के लिए हमारे पास पांच डिवीजन हैं। मैं प्रभावपूर्ण सिनेमा बनाने में विश्वास करती हूं। जिसके कारण ही हम ऑस्कर विजेता डॉक्यूमेंट शॉर्ट फिल्म ‘पीरियड.एंड ऑफ सेंटेंस’ से जुड़े। लॉकडाउन के समय से, दर्शक मनोरंजन के विभिन्न फॉर्मेट जैसे ऑडियो शो, शॉर्ट, स्नैकेबल कंटेंट, सब को ट्राइ करने लगे हैं। इस बीच सिख्या एंटरटेनमेंट में, हम पहले से ही पॉडकास्ट और ऑडियो शो पर काम कर रहे थे, शॉर्ट में हमने एक एंथोलॉजी, जिंदगी इनशॉर्ट (Zindagi inShort, Netflix 2020) बनाई। यह सभी हमारी फीचर फिल्मों के अलावे और प्रमुख प्रोजेक्ट थे। हमने हाल ही में इंटरैक्टिव थ्रिलर्स की दुनिया में ‘कौन? हू डीड ईट?’ (Kaun? Who Did It?) के प्रवेश किया है। वर्तमान में कई आने वाली प्रोजेक्ट्स हैं जिस पर पर काम चल रही है। सिख्या में मेरे 13 साल बीत जाने के बाद भी मुझे लगता है कि, ‘it is just a beginning’ (यह तो सिर्फ एक शुरुआत है)।

आप भारतीय फिल्मों को ग्लोबल मानचित्र, विशेष कर अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में ले जाने की मशाल वाहक रही हैं...
इमेज क्रेडिट: फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट। फाइल फोटो
आप भारतीय फिल्मों को ग्लोबल मानचित्र, विशेष कर अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में ले जाने की मशाल वाहक रही हैं…

बतौर प्रोड्यूसर एक स्वतंत्र फिल्म को बड़े फेस्टिवल में ले जाना बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है। मेरा पहला फिल्म फेस्टिवल में मेरा ब्रेकथ्रू 2012 में दैट गर्ल इन येलो बूट्स (That Girl in Yellow Boots) के साथ रहा। जिसे वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (Venice International Film Festival) में चुना गया था। फिल्म की स्क्रीनिंग से कम से कम दो महीने पहले नेटवर्किंग, ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूटर्स को फिल्म का सैंपल बनाने, समीक्षकों को इसे कवर करने, स्क्रीनिंग या प्रीमियर की डेट्स को तथा फेस्टिवल को समझने की जरूरत होती है। विश्व स्तर पर हमारी अनूठी कहानियों को बताने में सक्षम होने में लिए सालों की मेहनत छिपी होती है। मुझे लगता है कि निर्माता के रूप में हमें फिल्म फेस्टिवल से सीखते रहना चाहिए। क्योंकि हमारे काम को वैश्विक मंच देती हैं।

हमें अपने सिनेमा कलेक्टिव इंडियन वुमन राइजिंग के बारे में और बताएं…

मैं जिज्ञासा वश इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में फीमेल डायरेक्टर्स पर रिसर्च कर रही थी। पता चला कि भारतीय फिल्म उद्योग में हमारे पास केवल पांच प्रतिशत महिला निर्देशक हैं। मैंने इसे ताहिरा कश्यप खुराना (Tahira Kashyap Khurrana, wife of Ayushmann Khurrana) के साथ साझा किया। हमने इस बारे में कुछ करने का फैसला लिया। इसके बाद हमने एकता कपूर (Ekta Kapoor) से संपर्क किया, जो तुरत तैयार हो गईं। देखते-देखते इंडियन वुमन राइजिंग अस्तित्व में आई। रुचिका कपूर शेख (Ruchikaa Kapoor Shiekh) के साथ मिल कर हम चारों इस स्थिति को बदलने के लिए दृढ़ हैं। करिश्मा देव दूबे (Karishma Dev Dube) ने अपनी शॉर्ट फिल्म बिट्टू के लिए मुझसे संपर्क किया, जो ऑस्कर के लिए दावेदारी कर रही थी। हमने करिश्मा और उनकी फिल्म का समर्थन किया और कई फेस्टिवल्स की यात्रा की। हमने इस साल ऑस्कर में लाइव एक्शन शॉर्ट फिल्म श्रेणी में शीर्ष 10 में जगह बनाई। बिट्टू आईडब्ल्यूआर से आने वाली कई और रोमांचक प्रोजेक्ट्स में से पहली थी। योग्य भारतीय महिला फिल्म मेकर्स को मौके देने की हमारी कोशिश निरंतर जारी रहेगी।

गुनीत मोंगा सिनेमा कलेक्टिव इंडियन वुमन राइजिंग के बारे में
इमेज क्रेडिट: फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट। फाइल फोटो
अपनी यात्रा के बारे में विस्तार से हमें बताएं…

मैंने 16 साल की उम्र में दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में शुरुआत की थी। मैं फोटोकॉपी गर्ल थी, ऑफिस में सारी स्टेशनरी का स्टॉक रखती थी। फिर मैंने पान नलिन (Pan Nalin) के साथ इंटर्नशिप की। मेरे पास हमेशा पीपल स्किल  और चीजों को करने का उत्साह था, लेकिन मैंने इंटर्नशिप पर बहुत कुछ सीखा। इसके बाद और भी प्रोजेक्ट आए और कुछ साल बाद मैं लाइन प्रोड्यूसर बन गयी। कॉन्फिडेंस के साथ साहस आया और मैंने सकारात्मक रूप से काम करती रही। मैंने पैसे जुटाए और 21 साल की उम्र में एक प्रोड्यूसर बनने के लिए मुंबई आ गई। निर्माता के रूप में मेरी पहली फिल्म ‘से सलाम इंडिया’ (Say Salaam India) थी। इसके बाद मैंने अपनी खुद की कंपनी सिख्या एंटरटेनमेंट शुरू की और दासविदनिया (Dasvidaniya) का सह-निर्माण किया। 2008 में, मेरे साथ एक बहुत बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी हुई और मैंने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया। मैं इकलौती थी, मुझे दिल्ली के जीवनको भूल मुंबई में शिफ्ट होना पड़ा। मैंने बालाजी मोशन पिक्चर्स (Balaji Motion Pictures) में एक सुपरवाइजिंग प्रोड्यूसर के रूप में नौकरी की, फिर मुझे 2009 में अनुराग कश्यप फिल्म्स (Anurag Kashyap Films) में सीईओ के रूप में नियुक्त किया गया। पांच साल की अवधि में, मैंने दैट गर्ल इन येलो बूट्स, गैंग्स ऑफ वासेपुर 1 और 2, शैतान, अय्या, माइकल, ताशेर देश, शाहिद, तृष्णा, मानसून शूटआउट आदि जैसी फिल्मों का निर्माण किया।

अपनी सिनेमा जर्नी के बारे में गुनीत मोंगा कहती हैं कि लंचबॉक्स भले ही
इमेज क्रेडिट: फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट। फाइल फोटो

2013 में AKFPL बंद होने के बाद, मैं लंचबॉक्स के साथ सिख्या एंटरटेनमेंट के लिए वापस आ गयी और उसके बाद मसान, जुबान (Zubaan), हरामखोर (Haraamkhor), पेडलर्स (Peddlers), टाइगर्स (Tigers), व्हाट पीपल वील से (What People Will Say), आश्रम (Ashram), सोराराई पोट्रु (Sorrarai Pottru) और पग्लैट (Pagglait) का निर्माण की। अब मैं अपने प्रोडक्शन पार्टनर अचिन जैन (Achit Jain) के नेतृत्व में एक शानदार टीम के साथ अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी चलाती हूं।

जब बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ – 300 करोड़ क्लब वाली फिल्मों पर टिकी थी, उस समय गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी गेम-चेंजिंग फिल्मों का समर्थन करने के पीछे क्या सोच थी?

गैंग्स ऑफ वासेपुर अपने समय से आगे था और आने वाले वर्षों तक भारतीय सिनेमा का एक कल्ट क्लासिक बना रहेगा। यह अनुराग कश्यप की अनूठी वीजन थी, जिसने वह फिल्म बनाई जो आज वास्तविक है। मैं स्टोरी पावर और निर्माता की दूरदर्शिता में बहुत विश्वास रखती हूं। लेकिन जिस समय किसी फिल्म की सफलता को उसके बॉक्स ऑफिस से मापा जाता है तो वासेपुर स्पष्ट रूप से एक ऑफबीट फिल्म ही था।

अब ओटीटी की दुनिया है, गुनीत मोंगा अपनी फिल्मों को प्रासंगिक होते हुए देखती हैं?

आज हमारे पास जो पहचान है, उसे हासिल करने के लिए हर मोड़ पर हमने कई अमूल्य सबक पाया है। असफलताओं और सफलता के माध्यम से कई परियोजनाओं को लाने में वर्षों लग गए। कंटेंट या विषय के लिए हमेशा भूख थी, ओटीटी आ जाने की वजह से न केवल फिल्म निर्माताओं बल्कि अभिनेताओं, लेखकों को मंच प्रदान करने वाले नए बाजार को खोलने के लिए मजबूर किया है।

गुनीत ओटीटी की दुनिया में अपनी फिल्मों की प्रासंगिकता को कैसे देखती हैं?
इमेज क्रेडिट: फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट। फाइल फोटो
अगर आपकी (गुनीत मोंगा) की जर्नी में मील के पत्थर की बात करें?

हर प्रोजेक्ट ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया है। सफलताओं ने मुझे कृतज्ञता सिखाई है और असफलताओं ने मुझे बेहतर प्रयास करने के लिए प्रेरित किया है। मैं सीखते रहने में विश्वास करती हूं। मेरे लिए सभी असाइनमेंट, जिस पर मैंने काम किया है और अपनी ज्ञान और क्षमताओं को जोड़ा है, एक मील का पत्थर है। मैंने हर फिल्म को अपने दिल का टुकड़ा समझा है। और हर फिल्म में कुछ नया सीखा है। अगर मुझे कुछ प्रमुख पर उंगली उठानी है, तो मैं कहूंगी कि द लंचबॉक्स के लिए कान फिल्म समारोह में खड़े तालियों की गड़गड़ाहट आज भी मेरे दिमाग में गूंजती है। शॉर्ट डोक्यूमेंट्री ‘पीरियड.एंड ऑफ सेंटेंस’ ऑस्कर में सबकी पसंद रही। और अब पगलैट।

बाफ्टा में नामांकन और अकादमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंस में सम्मानित होने वाली पहली भारतीय प्रोड्यूसर हैं, इस तरह की उपलब्धियां कितनी महत्वपूर्ण हैं?

उपलब्धियां और पुरस्कार हमेशा विशेष होते हैं, वे हमारे द्वारा अपने काम में की गई कड़ी मेहनत और समर्पण को मान्य करते हैं। और हमें उन उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जो हमें सम्मान के काबिल बनाते हैं। द शेवेलियर डान्स आई’ऑर्ड्रे डेस आर्ट्स एट डेस लेट्रेस (नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स) मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य था, मैं फ्रेंच फिल्में देखते हुती हुई बड़ी हुई हूं, और फिर उसी देश द्वारा पहचाना जाना एक सम्मान की बात है। यह मुझे विनम्रता से भर देता है और साथ ही मुझे अपनी कामों में और अधिक बेहतर करने के लिए प्रेरित करता है!

Read the latest and breaking Hindi news on moviezoobie.com. Get Hindi news about Bollywood, Hollywood, Lifestyle, Relationship, Celebrity and much more.

क्रेडिट: फिल्मफेयर मिडिल ईस्ट । Aakanksha Naval-Shetye

Related posts

Leave a Comment