द काइट रनर (The Kite Runner) मार्क फोर्स्टर की वो फिल्म जिसके अभिनेताओं को जान बचाने के लिए सिक्योरिटी में रहना पड़ा

द काइट रनर (The Kite Runner) मार्क फॉर्स्टर की वो फिल्म जिसके अभिनेताओं को जान बचाने के लिए सिक्योरिटी में रहना पड़ा

मनोज धना मेहरा, मुंबई‘द काइट रनर’, दो पतंगबाज बच्चों की दोस्ती पर बनी एक ऐसी फिल्म जो शायद मैंने अभी तक तो नहीं देखी होगी। बशर्ते कि आप बॉलीवुड में भागते-भागते बड़े हो जाने वालों बच्चों की बात ना करें। स्लमडॉग मिलियनर (Slumdog Millionaire) कुछ हद तक थी ऐसी फिल्म मगर फिर भी किसी और तरीके से स्टोरी को कहती है। फिलहाल बात करते है फिल्म The Kite Runner की। खालिद होसेनी (Khaled Hosseini) ने एक किताब लिखी थी 2003 में , इसी नाम से, जो कि बहुत पॉपुलर हुई थी। कई सारी वार्षिक लिस्टो में इस किताब को सम्मिलित भी की गई। उस किताब की प्रसिद्धि का आलम ये था, कि जब 2007 में फिल्म बनकर आयी तो फिल्म को कई महीनों का इंतजार भी करना पड़ा। साथ ही कलाकारों को कई तरह ही सिक्योरिटी में रखा गया। यहां तक कि बच्चों के किरदार जिन दो अफगानी बच्चो (Ahmad Khan Mahmoodzada और Zekeria Ebrahimi) ने करे है उन्हें तो तकरीबन जवानी तक डर कर रहना पड़ा। हाल ही में उनकी पढ़ाई लिखाई पूरी हुई हैं। इस फिल्म का निर्देशन मार्क फोर्स्टर (Marc Forster) ने किया था।

बचपन की दोस्ती को मार्मिक अंदाज में दर्शाती है फिल्म ‘द काइट रनर’ की कहानी (The Kite Runner depicts childhood friendship in a touching way)

बमुश्किल 10-12 साल के दो लड़के आमिर और हसन बहुत अच्छे दोस्त हैं। दोनों पतंगबाजी में माहिर, काबुल की गलियों में खुश, दौड़ते रहते, खाते पीते, किताबों और फिल्मो के शौकीन हैं। आमिर छोटा सा बच्चा एक बहुत ही समृद्ध परिवार का वंशज जिसे कहानियां सुनने और सुनाने का शौक है। वही हसन उसके घर के पुराने नौकर अली का बेटा है। जो आमिर के साथ में ही रहता है। आमिर के अब्बा जान बहुत बड़े बिजनेस मैन हैं। शहर में उनका खूब दबदबा है। अब्बा हुजूर एक मॉडर्न सोच के आदमी हैं। जो ये मानते हैं, कि धर्म को समझने के लिए किताबों को रटना या मुल्लागिरी करना और उनकी सुनना जरूरी नही हैं। बस किसी के साथ गलत ना किया जाए और चोरी ना की जाए तो अल्लाह खुश रहता है। उन्हें महंगी स्कॉच पीने का शौक है, सिगरेट भी पीते है, बड़ी गाड़ी, ऐशो आराम, घर बार सब बहुत अच्छा है। वो समाज की मदद भी करते हैं, स्कूल-कॉलेज और धार्मिक काम के लिए पैसा भी देते हैं। वो जानते हैं, कि पैसा सही जगह नही लगेगा और खा लिया जाएगा।

और भी बहुत कुछ है, ये फिल्म मेरे जेहन में घुसकर भारतीय परिवेश में हलचल मचा देती हैं। कई सारी बातों में मैं भारतीय होने का शुक्रगुजार होता हूं। वहीं कुछ बातों को लेकर सोच में पड़ जाता हूं। कभी खुश होता हूं और कभी बहुत दुःखी। – मनोज धना मेहरा

क्यों देखनी चाहिए फिल्म द काइट रनर (Why should watch The Kite Runner)
  • बचपन की दोस्ती क्या होती है, ये समझने के लिए।
  • कैसे धर्म और पैसे ने पूरी दुनियां को अपने हिसाब से नचा रखा है।
  • जो लोग सिर्फ भारत की परेशानियों की दुहाई देते है उन्हें ये समझना चाहिए कि इंटरनेशनल प्लेटफार्म पर वास्तविक समीकरण क्या हैं?
  • इस्लाम, हिन्दू, कम्युनिस्ट, क्रिस्चियन ये सब कहने वाली बातें हैं, कैसे कैसे वक़्त वक़्त पर सब अपने अपने हिसाब से दुनियां को देखते हैं और समझते है।
  • अफगानिस्तान, पाकिस्तान, रूस, चीन, भारत और अमेरिका की पिछले 50 सालों की कारस्तानी समझने के लिए।
  • इस्लामीकरण, कम्युनिज्म और डेमोक्रेसी तीनो को समझने के लिए।
  • तेल नही तेल की धार को देखों, इसलिए धर्म नही ये देखो पैसा कहाँ से आ रहा है और किधर जा रहा हैं, ये समझ मे आएगा इस फ़िल्म से।
  • मानवाधिकार और एक्सट्रेमिज्म ने क्या नंगा नाच मचा रखा है।
  • बचपन लगभग सबका एक जैसा होता है इसलिए बच्चों को कोई नफरत नही होती किसी से। उनको कैसे नफरत करना सिखाया जाता है। हसन को जब एक दूसरा बड़ा बच्चा “हजारा” समाज का कहकर बोलता है कि तुम असली अफगानी नही हो तो अमूमन हिन्दोस्तां की याद आ जाती है।
  • बच्चों के साथ होने वाला यौन शोषण एक वैश्विक समस्या है और उन जगहों पर तो और बुरा हाल है जहां जान की कोई कीमत नही।
  • अमेरिका, चीन और रूस किस तरह से सत्ता खेल रहे है और तीसरी दुनिया (एशिया और अफ्रीका) कैसे बर्बाद होता रहा है।
  • इतने बेहतरीन पतंग बाजी के दृश्य मैंने असलियत में कभी नही देखें जो इस फिल्म में है। दिल करने लगता है कि काश पतंग उड़ाई जाए जो शायद शहरों के हम जैसे बच्चो को कभी समझ नही आएगा कि खेतो और पहाड़ों में कैसा मजा आता होगा।
  • अपराधबोध, माफी, गाली, प्यार, नफरत और हथियार, अशिक्षा जैसी चीजें क्या क्या करवाती हैं और समाज कैसे इसमें ढलता चला जाता है।
  • बेहतरीन अदाकारी, खासतौर पर बच्चो की और अब्बा जान की, आप हैरान हो जाएंगे। उनका तल्लाफुज इतना साफ है कि मैं उतना लिख नही सकता । अगर असली कॉपी में फिल्म देखेंगे तो पाएंगे कि कितने ही पारसी और उर्दू शब्द हिंदुस्तानी भाषा मे घुल मिल चुकी है।
  • संगीत इतना जबरदस्त है कि हर जगह नॉमिनेट किया गया। लोकेशन चूंकि असल काबुल नही दिखाया गया , सिक्योरिटी की वजह से इसलिए चीन के एक हिस्से में शूट किया गया। जो बेहद मार्मिक तरीके से फिल्माया गया है। 2 से 3 जगह आप ऐसा कुछ देखेंगे फिल्म में कि आपके दिल से आह निकल जायेगी और आप गुस्से से भर जाएंगे। आपको एक दो जगह बहुत प्यार भी आएगा। एक बाप कैसे अपने बच्चों के लिए कुछ कर जाता है वो दिखेगा। एक कर्मठ आदमी, कैसे अपना सब खोकर एक उम्मीद में जिंदगी बिता देता है।
  • अफगानियों की रूसियो के लिए नफरत दिखाई है। दरअसल, फिल्म की मूल में कहानी यह है, कि असल मे एक सरकार जब कट्टरवाद को मदद करती है तो कैसे पूरा समाज खत्म हो जाता है।

और भी बहुत कुछ है, ये फिल्म मेरे जेहन में घुसकर भारतीय परिवेश में हलचल मचा देती हैं। कई सारी बातों में मैं भारतीय होने का शुक्रगुजार होता हूं। वहीं कुछ बातों को लेकर सोच में पड़ जाता हूं। कभी खुश होता हूं और कभी बहुत दुःखी। कुल मिलाकर कई फिल्में देखी है जो किसी किताब पर बनी है उसमें अगर देवदास और एक दो और नामों को छोड़ दिया जाए तो इससे बेहतर काम फिलहाल तो नही याद आता । हो सकता है ये एक अतिश्योक्ति भी हो। जैसा मुझे रॉबर्ट डाऊनी जूनियर (Robert Downey, Jr.) की चैपलिन (Chaplin 1992, रिचर्ड एटनबरो) देखने के बाद लगा था, कि इससे बेहतर बायोग्राफी ट्रिब्यूट नही हो सकता कुछ।

खैर लिखकर और क्या बताएं, फिल्म देखिये दोस्तों। आप पतंगबाजी, रूस्तम और सोहराब की कहानी और संगीत में खो जाएंगे।

द काइट रनर का ट्रेलर देखें

क्रेडिट: पारामाउंट मूवीज

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